आज बात हैं हमारे देश के पॉलिटिक्स की इसकी परिस्तिथि , व्यवस्था और सरकार।
आज के युग में हर कोई राजनिति में आना चाहता है चाहे हो पढ़ा लिखा हो या फिर सिर्फ सिग्नेचर करना ही सिर्फ आता हो क्यूंकि आमदनी ही इतनी हो गयी। किसी परिवार का एक आदमी एक विधायक बन जाए बस उसके बाद उसको और उसके परिवार को कुछ सोचने की जरुरत नहीं। आज के युग मेरा मानना है की देश में राजनेता नहीं बल्कि सब के सब राजनीतिज्ञ हैं। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि आज के युग में जीतना ही सब कुछ है चाहे उन्हें किसी भी हद तक जाना पड़े , छाये जितने भी वादे करने पड़े इससे गुरेज नहीं करेंगे। चाहे हक़ीक़त में उस काम को करने की कैपेसिटी उनके पास हो या न हो बस लच्छे दार भाषण देना आना चाहिए . ये सिर्फ एक पार्टी विशेष की बात नहीं है बल्कि हर किसी का यही दस्तूर बन गया है , जनता के बीच आकर और उनका मत लेकर सरकार बनाना हर कोई चाहता है लेकिन सरकार बनाने के बाद उसी जनता की कोई बात सुनने को तैयार नहीं रहता है। ४ सालो तक सरकार में रहकर अपने मनमाफिक सरकार चलाते हैं और उसके बाद जब फिर १ साल बचता है तो फिर उन्ही वादों के साथ उसी जनता के बीच आकर फिर वोट के लिए अपील करते हैं। अब जनता करे भी तो क्या करे अगर इनको सत्ता से हटाती और दूसरी पार्टी को जीताती है इस उम्मीद के साथ की शायद हमारे बेहतरी के लिए ये कुछ करे। लेकिन अंत में होता क्या है इनका भी हाल वही हो जाता है। ये भी चाहते हैं जितना हो सके अपना विकास करलो जनता की जब बात आएगी तब दूसरी पार्टी ने ये किया था , वो किया था इसलिए सिस्टम को सुधारने लिए टाइम चाहिए इस बात का आश्वासन देते रहेंगे । टाइम मांगते मांगते पूरा वक्त गुजर जाता है। बेचारी जनता वही कि
वहीँ खड़ी दिखाई देती हैं लेकिन उन्होंने जिन्हे चुनकर विधानसभा भेजा था उनको देखा जाए तो उनका असीमित विकाश हो जाता है। कही पर फला साहब का डिग्री कॉलेज है ,कही पर फला साहब का हॉस्पिटल है , कहीं पर फ्ला साहब का पेट्रोल पम्प है। इनका सिर्फ विकाश ही विकाश दिखाई देता है
आज के युग में हर कोई राजनिति में आना चाहता है चाहे हो पढ़ा लिखा हो या फिर सिर्फ सिग्नेचर करना ही सिर्फ आता हो क्यूंकि आमदनी ही इतनी हो गयी। किसी परिवार का एक आदमी एक विधायक बन जाए बस उसके बाद उसको और उसके परिवार को कुछ सोचने की जरुरत नहीं। आज के युग मेरा मानना है की देश में राजनेता नहीं बल्कि सब के सब राजनीतिज्ञ हैं। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि आज के युग में जीतना ही सब कुछ है चाहे उन्हें किसी भी हद तक जाना पड़े , छाये जितने भी वादे करने पड़े इससे गुरेज नहीं करेंगे। चाहे हक़ीक़त में उस काम को करने की कैपेसिटी उनके पास हो या न हो बस लच्छे दार भाषण देना आना चाहिए . ये सिर्फ एक पार्टी विशेष की बात नहीं है बल्कि हर किसी का यही दस्तूर बन गया है , जनता के बीच आकर और उनका मत लेकर सरकार बनाना हर कोई चाहता है लेकिन सरकार बनाने के बाद उसी जनता की कोई बात सुनने को तैयार नहीं रहता है। ४ सालो तक सरकार में रहकर अपने मनमाफिक सरकार चलाते हैं और उसके बाद जब फिर १ साल बचता है तो फिर उन्ही वादों के साथ उसी जनता के बीच आकर फिर वोट के लिए अपील करते हैं। अब जनता करे भी तो क्या करे अगर इनको सत्ता से हटाती और दूसरी पार्टी को जीताती है इस उम्मीद के साथ की शायद हमारे बेहतरी के लिए ये कुछ करे। लेकिन अंत में होता क्या है इनका भी हाल वही हो जाता है। ये भी चाहते हैं जितना हो सके अपना विकास करलो जनता की जब बात आएगी तब दूसरी पार्टी ने ये किया था , वो किया था इसलिए सिस्टम को सुधारने लिए टाइम चाहिए इस बात का आश्वासन देते रहेंगे । टाइम मांगते मांगते पूरा वक्त गुजर जाता है। बेचारी जनता वही कि
वहीँ खड़ी दिखाई देती हैं लेकिन उन्होंने जिन्हे चुनकर विधानसभा भेजा था उनको देखा जाए तो उनका असीमित विकाश हो जाता है। कही पर फला साहब का डिग्री कॉलेज है ,कही पर फला साहब का हॉस्पिटल है , कहीं पर फ्ला साहब का पेट्रोल पम्प है। इनका सिर्फ विकाश ही विकाश दिखाई देता है

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