एक रात का वर्णन एक मेरी खुद की कहानी का वर्णन करती है । ये बात उस समय की है जब मेरे दसवीं परीक्षा शुरू होने का आखिरी रात थी ।उस रात मेरे उपर एक अलग ही कैफियत छायी हुई थी ।मन कही और था और दिमाग कही और । कुछ समझ मे नही आ रहा था कि क्या करू।दिल बड़ा बेचैन हो रहा था । मन मे एक सोच दौड़ लगा रही थी कि कल क्या होगा ।क्या मेरी तैयारी मुकम्मल है । क्या कल मै अपना बेस्ट दे पाउँगा । ये सवाल उठना भी वाजिब था क्योंकि इससे पहले न बोर्ड परीक्षा का कोई अनुभव था और न ही कोई मार्गदर्शक और ऊपर से घर से दूर रहकर अपने आप को वहाँ एडजस्ट करना ऐसी बहुत सारी चीज़े थी। ये रात न जाने क्यों छोटी सी लग रही थी वक्त कैसे बीते जा रहा था पता ही नही चल रहा था पर अगर सच्चाई बताऊँ तो मन यही कर रहा था कि ये रात आज खत्म ही न हो । मगर कुदरत के बनाये हुए बदलते कहाँ है । चलिए जैसे -तैसे रात गुजरी सुबह की सफेदी नमूदार हुई। मन को अपने लक्ष्य की ओर रवाना कर दिया की अब आज चाहे जो भी देना अपना बेस्ट है और कुछ नही ।आगे जो होना है वो अपने बस में नही है। फिर क्या था पूरी शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ । जब सेन्टर पर पहुंचा तो चेकिंग के बाद सीधे अपने कमरे मे पहुंच गया और पेपर मिलने इन्तजार करता रहा लेकिन इस वक्त मै नर्वस बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि एक सज्जन ने मुझसे कहा था कि ये 15 मिनट अपने आप को सम्भाल कर रखना और मै ऐसा करने मे कामयाब रहा ।पेपर मिला उसे देखते ही दिल खुशियों से मचलने लगा।बस फिर क्या था मैने लिखना शुरू और करीब आधा घण्टा पहले मेरा पेपर कम्प्लीट हो गया। उसी दिन से डर खत्म मगर थोड़ी चिंता जरूर रहती है
Wednesday, 14 March 2018
Saturday, 3 March 2018
SIKHSHA KA GIRTA ISTAR
आज मन कर रहा है की हमारे देश की शिक्षा की बात कर ली जाए। इसके महत्व को जान लिया जाए। इसकी जरुरत को समझ लिया जाए और हमारे जीवन इसका उपयोग क्या है , जी हाँ दोस्तों लेकिन जब हम इसकी बात करना शुरू करे उससे पहले हमें इसे दो भागों में बाट लेना चाहिए।
१. शहरी शिक्षा
२. ग्रामीण शिक्षा
ऐसा इसलिए क्यूंकि इन दोनों जगहों की शिक्षा में बहुत अंतर है. हमारे देश में शहरी क्षेत्र में शिक्षा का हाल तो ठीक ठाक है मगर ग्रामीण स्तर पर अभी इसका इतना विकाश नहीं हो पाया है. मेरे हिसाब से इसका सबसे बड़ा कारण ग्रामीण के लोगों की सोच भी है। दूसरी आमदनी का जरिया , और तीसरा माहोल। मेरे हिसाब ये तीन चीजें ज्यादा जिम्मेदार हैं इसके लिए। सब चीजों के बाद कुछ अगर तैयार भी रहते हैं तो उनको हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था तोड़ के रख देती है। इस वक्त हमारे देश की सीख्शा व्यवस्था किसी छुपा नहीं है मगर कोई इस पर कुछ करने को तैयार है। मगर इस व्यवस्था ने न जाने कितनो की जिन्दगियाँ बर्बाद कर दी / और साथ में जिनके पास सिर्फ पैसा था उनको इसी व्यवस्था ने अच्छे अच्छे पदों पर ले जाकर बैठा दिया है। ये बात मै सबके लिए नहीं कह रहा हूँ लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनके पास ज्ञान काम था मगर पैसा ज्यादा था। मगर वही जो गरीब बच्चा था जिसने अपनी जवानी सिर्फ और सिर्फ पढ़ने में बिता दी अंत में आके उसे बेकार घूमना पड़ता हैं। इसकी वजह की थी मेरे समझ से पैसा। कभी कभी दिल टूट जाता कोई अपनी जिंदगी के २०-२५ साल इसी में गुजार देता है लेकिन अंत में उसे कुछ हासिल नहीं होता है भले ही उसके पास ज्ञान का भंडार पडा हो। आज हमारे देश में नौकरियों को बेचा जाता है , रेट फिक्स किया जाता है। आइये रुपया दीजिये और जोइनिंग लेटर ले जाईये। इस बात का मेरे पास सबूत नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कोई इस बात से इत्तिफाक नहीं रखता है।
मै खुद अपनी बात करूँ तो मैंने भी अपनी जिंदगी के २१ साल इसी में गुजार दिए मगर अभी तक बेकार बैठा हूँ लेकिन वहीँ पर मै देखता हूँ की मेरे साथ पढ़ने वाले जिन्होंने १० - १२ में पढाई छोड़ दी थी आज जब मई उनसे मिलता हूँ तो अपने आप को बहुत पीछे पता हूँ , क्यूंकि वो १० और १२ तक पढ़कर आज अच्छे खासे पैसे कमा रहे हैं और मेरी हालत ये है की ठीक ढंग से अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं उठा पा रहा हूँ। मगर एक उम्मीद है काश हमारी शिक्षा व्यस्था फिर से वही ९० के दसक वाली हो जाए
मै इस बात को इस लिए नहीं कर रहा सिलेबस बदला जाये जी नहीं मगर हमअरे देश जो नौकरियों का माहोल है वो बदला जाए , जो उस पद के लिए वाकई में काबिल है।
१. शहरी शिक्षा
२. ग्रामीण शिक्षा
ऐसा इसलिए क्यूंकि इन दोनों जगहों की शिक्षा में बहुत अंतर है. हमारे देश में शहरी क्षेत्र में शिक्षा का हाल तो ठीक ठाक है मगर ग्रामीण स्तर पर अभी इसका इतना विकाश नहीं हो पाया है. मेरे हिसाब से इसका सबसे बड़ा कारण ग्रामीण के लोगों की सोच भी है। दूसरी आमदनी का जरिया , और तीसरा माहोल। मेरे हिसाब ये तीन चीजें ज्यादा जिम्मेदार हैं इसके लिए। सब चीजों के बाद कुछ अगर तैयार भी रहते हैं तो उनको हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था तोड़ के रख देती है। इस वक्त हमारे देश की सीख्शा व्यवस्था किसी छुपा नहीं है मगर कोई इस पर कुछ करने को तैयार है। मगर इस व्यवस्था ने न जाने कितनो की जिन्दगियाँ बर्बाद कर दी / और साथ में जिनके पास सिर्फ पैसा था उनको इसी व्यवस्था ने अच्छे अच्छे पदों पर ले जाकर बैठा दिया है। ये बात मै सबके लिए नहीं कह रहा हूँ लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनके पास ज्ञान काम था मगर पैसा ज्यादा था। मगर वही जो गरीब बच्चा था जिसने अपनी जवानी सिर्फ और सिर्फ पढ़ने में बिता दी अंत में आके उसे बेकार घूमना पड़ता हैं। इसकी वजह की थी मेरे समझ से पैसा। कभी कभी दिल टूट जाता कोई अपनी जिंदगी के २०-२५ साल इसी में गुजार देता है लेकिन अंत में उसे कुछ हासिल नहीं होता है भले ही उसके पास ज्ञान का भंडार पडा हो। आज हमारे देश में नौकरियों को बेचा जाता है , रेट फिक्स किया जाता है। आइये रुपया दीजिये और जोइनिंग लेटर ले जाईये। इस बात का मेरे पास सबूत नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कोई इस बात से इत्तिफाक नहीं रखता है।
मै खुद अपनी बात करूँ तो मैंने भी अपनी जिंदगी के २१ साल इसी में गुजार दिए मगर अभी तक बेकार बैठा हूँ लेकिन वहीँ पर मै देखता हूँ की मेरे साथ पढ़ने वाले जिन्होंने १० - १२ में पढाई छोड़ दी थी आज जब मई उनसे मिलता हूँ तो अपने आप को बहुत पीछे पता हूँ , क्यूंकि वो १० और १२ तक पढ़कर आज अच्छे खासे पैसे कमा रहे हैं और मेरी हालत ये है की ठीक ढंग से अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं उठा पा रहा हूँ। मगर एक उम्मीद है काश हमारी शिक्षा व्यस्था फिर से वही ९० के दसक वाली हो जाए
मै इस बात को इस लिए नहीं कर रहा सिलेबस बदला जाये जी नहीं मगर हमअरे देश जो नौकरियों का माहोल है वो बदला जाए , जो उस पद के लिए वाकई में काबिल है।
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